विधायक जी बने “आज़ादी के बंदी”:

विधायक जी बने “आज़ादी के बंदी”:

विधायक जी बने “आज़ादी के बंदी”: मेरठ लखनऊ के सियासी रंगमंच पर मंगलवार को एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने हर किसी को चौंका दिया,समाजवादी पार्टी के मेरठ सरधना विधायक अतुल प्रधान ने खुद को जंजीरों में जकड़ लिया! जी हां, आपने सही सुना—ना तो किसी अदालत ने सजा सुनाई थी, न ही किसी पुलिस वाले ने हथकड़ी पहनाई थी। यह तो खुद विधायक जी की क्रांतिकारी भावना थी, जो सरकार की बेरोजगारी नीति पर भारी पड़ रही थी। ( सरकार नहीं दे रही रोजगार, तो खुद को कैदी बना लिया! ) विधायक जी का कहना था कि सरकार रोजगार देने में पूरी तरह विफल हो चुकी है। नौजवानों को नौकरी के नाम पर सिर्फ वादों की घुट्टी पिलाई जा रही है, और हकीकत में वे बेरोजगारी की जंजीरों में जकड़े हुए हैं। शायद इसी भावनात्मक लगाव के चलते विधायक जी ने सोचा कि क्यों न वे खुद भी जंजीरों में बंध जाएं—ताकि सरकार को एहसास हो कि बेरोजगारी सच में बंधन का दूसरा नाम बन चुकी है।*”डंकी रूट” और सरकार की विदेश नीति””विधायक जी ने बताया कि बेरोजगारी से तंग आकर लोग “डंकी रूट” के सहारे विदेश जा रहे हैं। लेकिन वहां पहुंचकर जब उन्हें पकड़ा जाता है, तो हाथों में असली हथकड़ियां पड़ जाती हैं। मतलब, भारत में बेरोजगारी की जंजीरें और विदेश में कानूनी हथकड़ियां—सारा दोष सरकार का!*आखिर यह जंजीरें खुलेंगी कैसे?*अब सवाल यह उठता है कि विधायक जी की यह प्रदर्शनकारी जंजीरें कब खुलेंगी? क्या सरकार उनकी मांगें मान लेगी, या फिर अगले चुनाव तक वे इसी तरह खुद को बांधते रहेंगे? जनता यह देखने के लिए उत्सुक है कि यह नाटक किसी ठोस बदलाव में बदलेगा या महज एक दिन का राजनीतिक ड्रामा बनकर रह जाएगा आखिर में, यह सवाल तो बनता ही है—विधायक जी ने जंजीरें खुद बांधी थीं, तो खोलेंगे भी खुद ही या इसके लिए भी सरकार को दोष देंगे?

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