रिपोर्ट लोकेश कुमार
कड़ी धूप में तैनात ट्रैफिक पुलिसकर्मी की बेबसी—न प्रचार छांव देता है, न प्रशासन सहारा
मेरठ! गर्मियों की तपती दोपहरी में जब आम आदमी घर की छांव या दफ्तर की एयरकंडीशन्ड दीवारों के पीछे खुद को सुरक्षित महसूस करता है, ऐसे में कुछ चेहरे ऐसे भी हैं जो पसीने में लथपथ होकर अपनी ड्यूटी को प्राथमिकता देते हैं। मेरठ मे जगह जगह तैनात ट्रैफिक पुलिसकर्मी इसकी जीती-जागती मिसाल हैं।धूप में तपती ड्यूटी, मगर न कोई छांव न कोई सुविधा: मवाना टाइम्स के संवाददाता जब शहर के चौराहे पर, देखा कि कड़ी धूप के बीच यह पुलिसकर्मी बिना किसी छांव या सुरक्षात्मक साधन के, यातायात को नियंत्रित कर रहे थे। पसीने से भीगा चेहरा, झुकी हुई पीठ और आंखों में ड्यूटी की जिम्मेदारी का उजाला। जब संवाददाता ने उनसे पूछा कि वह इस भीषण गर्मी में बिना किसी छांव के कैसे खड़े रहते हैं, तो उनका सहज जवाब था, “ड्यूटी है साहब!” केवल एक छोटा-सा “मयूर” ब्रांड का पानी का जग था, जिससे न सिर्फ वह खुद प्यास बुझाते हैं, बल्कि राह चलते मुसाफिरों को भी पानी देने से नहीं चूकते। ऐसे हालात में जब हम देखते हैं कि बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने प्रचार के लिए जगह-जगह छतरियां लगवा रही हैं, तो सवाल उठता है कि क्या ऐसी कोई भी कंपनी या संस्था इन जांबाज़ पुलिसकर्मियों के लिए एक छतरी तक नहीं लगवा सकती?चौराहों पर सिर्फ नजरें पुलिस की उगाही पर, पर सेवा पर नहीं कोई चर्चा: अक्सर आम जनता की नजर पुलिस की उगाही या चालान काटने की कार्रवाई पर पड़ती है, लेकिन जो पुलिसकर्मी धूप, बारिश और धूल-धक्कड़ में दिनभर खड़े रहते हैं, उनकी सेवा पर किसी की नजर नहीं जाती। यातायात व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऐसे जवान सड़कों पर अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं, लेकिन उनके लिए कोई बुनियादी सुविधा तक नहीं मुहैया कराई गई।प्रशासन और कंपनियों से सवाल क्या सिर्फ प्रचार ही प्राथमिकता है?आज जब CSR (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के अंतर्गत कंपनियों को समाज के लिए कार्य करना अनिवार्य है, तब ये प्रश्न उठना लाजमी है कि क्या उन कंपनियों की जिम्मेदारी सिर्फ अपने ब्रांड प्रचार तक सीमित है? क्या प्रशासन को यह नहीं दिखता कि ट्रैफिक पुलिस, विशेषकर बुजुर्ग जवान, किस हाल में दिनभर खड़े रहते हैं?मवाना टाइम्स समाचार पत्र परिवार की अपील: मवाना टाइम्स प्रशासन से अपील करता है कि इस ग्रीष्मकालीन मौसम की तीव्रता को ध्यान में रखते हुए ट्रैफिक पुलिसकर्मियों के लिए हर चौराहे पर छांव, पानी, और प्राथमिक राहत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। साथ ही, शहर की जागरूक कंपनियों और सामाजिक संस्थाओं से भी आग्रह है कि वे अपने प्रचार से इतर, समाज की सेवा में लगे इन सच्चे कर्मयोगियों के लिए भी आगे आएं।सेवा की तपिश में झुलसते चेहरे, देश की व्यवस्था की रीढ़ हैं—उन्हें सम्मान दें, सहारा दें।और जो गलत है उन पर कार्यवाही करें!
