रिपोर्ट लोकेश कुमार।
रिपोर्ट लोकेश कुमार मवाना टाईम्स।मेरठ: शहर के निजी स्कूलों की मनमानी से अभिभावकों में भारी आक्रोश है। विभिन्न स्कूलों द्वारा किताबों, यूनिफॉर्म और स्टेशनरी की खरीद को लेकर अनावश्यक नियम थोपे जा रहे हैं, जिससे माता-पिता को न केवल आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है बल्कि वे अपनी पसंद से सामान खरीदने की स्वतंत्रता से भी वंचित हो रहे हैं। मामला गढ़ रोड के गीतांजलि पब्लिक स्कूल सिसौली का भी सामने आया जहां प्रकाशन से 30/. पर किताबें अपनी दुकानों पर रख कर 60/. तक महंगी बची जा रही है।1. स्कूलों की दुकान से ही खरीदने का दबावमेरठ के कई निजी स्कूलों ने माता-पिता को यह निर्देश दे दिया है कि वे केवल स्कूल द्वारा अधिकृत दुकानों से ही किताबें और स्टेशनरी खरीदें। आमतौर पर, ये दुकानें स्कूल प्रशासन से जुड़ी होती हैं, जहां एमआरपी से ज्यादा कीमत पर सामान बेचा जाता है। अगर कोई अभिभावक बाहर से खरीदने की कोशिश करता है, तो बच्चों को स्कूल में परेशान किया जाता है या फिर उनके एडमिशन पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं।2. महंगी किताबें और गैर-जरूरी स्टेशनरीसरकारी नियमों के अनुसार, स्कूलों में NCERT या राज्य बोर्ड की किताबें अनिवार्य रूप से लागू होनी चाहिए, लेकिन कई स्कूल प्राइवेट पब्लिशर्स की महंगी किताबें थोप रहे हैं। कुछ किताबों की कीमत बाजार दर से कई गुना ज्यादा होती है। इसके अलावा, स्टेशनरी और कवर आदि भी स्कूल की दुकान से ही लेने का दबाव डाला जाता है।3. यूनिफॉर्म और बैग भी स्कूल से ही खरीदने की बाध्यतामेरठ के कई स्कूलों में यूनिफॉर्म, टाई, बेल्ट, जूते और यहां तक कि स्कूल बैग भी उन्हीं दुकानों से खरीदने का निर्देश दिया गया है, जिनका सीधा संबंध स्कूल प्रबंधन से होता है। यह सामान सामान्य बाजार की तुलना में 50-60% महंगा बेचा जाता है।4. मनमानी फीस और अनावश्यक शुल्ककई स्कूल एडमिशन फीस के अलावा कई तरह के छुपे हुए चार्ज वसूल रहे हैं, जैसे स्मार्ट क्लास फीस, डेवलपमेंट चार्ज, मेंटेनेंस फीस आदि। इन चार्जेस को लेकर जब कोई अभिभावक सवाल करता है, तो उन्हें कहा जाता है कि यह स्कूल की पॉलिसी है।5. अभिभावकों का विरोध और प्रशासन की चुप्पीमेरठ में कई अभिभावकों ने इस जबरदस्ती के खिलाफ आवाज उठाई है, लेकिन शिक्षा विभाग और प्रशासन की चुप्पी के कारण स्कूलों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। कुछ अभिभावक समूहों ने इस मामले को लेकर डीएम और जिला शिक्षा अधिकारी से शिकायत भी की है, लेकिन अब तक कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है।6. कानूनी पहल और समाधान के प्रयासअभिभावकों ने अब इस मुद्दे पर आरटीआई दायर करने और न्यायालय का सहारा लेने की योजना बनाई है। शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार, स्कूल किसी भी दुकान से सामान खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकते, लेकिन फिर भी इस पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो रही है।मेरठ के निजी स्कूलों की यह मनमानी न केवल अभिभावकों के बजट पर भारी पड़ रही है, बल्कि यह एक तरह से शिक्षा के व्यवसायीकरण का भी बड़ा उदाहरण है। यदि प्रशासन ने जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है। अभिभावकों का कहना है कि वे इस मुद्दे पर एकजुट होकर प्रदर्शन करेंगे और जरूरत पड़ने पर कोर्ट का रुख भी करेंगे।क्या कहते हैं अधिकारी?जिला शिक्षा अधिकारी ने इस मामले में कहा है कि यदि किसी भी स्कूल की ऐसी शिकायत मिलती है, तो उस पर कार्रवाई की जाएगी। अभिभावकों से अपील की गई है कि वे लिखित शिकायत दर्ज कराएं ताकि उचित जांच हो सके।
