हर चौराहे पर अलाउन्समेंट, फिर भी क़ानून का मज़ाक: मेरठ के यातायात व्यवस्था पर बड़ा सवाल:ज़मीनी हकीकत और सिस्टम की विफलता :

हर चौराहे पर अलाउन्समेंट, फिर भी क़ानून का मज़ाक: मेरठ के यातायात व्यवस्था पर बड़ा सवाल:ज़मीनी हकीकत और सिस्टम की विफलता :

मेरठ शहर के हर चौराहे पर लगे माइक, सड़कों पर बोर्ड और जगह-जगह मौजूद ट्रैफिक पुलिस — ये सब मिलकर लोगों को यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि “कानून का पालन करें।” लेकिन असलियत इन घोषणाओं से बिल्कुल उलट है। कानून तोड़ने वाले खुलेआम घूम रहे हैं, और व्यवस्था नाम मात्र की दिखाई देती है।
घोषणाओं की हकीकत बनाम ज़मीनी हकीकत:

  1. घोषणा: “18 साल से कम उम्र के बच्चे वाहन न चलाएं!”
    हकीकत : सुबह-सुबह स्कूली यूनिफॉर्म में नाबालिग बच्चे स्कूटी, बाइक लेकर सड़कों पर फर्राटा भरते हैं। इनमें से कई तो हेलमेट तक नहीं पहनते।
  2. घोषणा: “बिना हेलमेट के दो पहिया वाहन न चलाएं!”
    हकीकत: ट्रैफिक सिग्नल पर खड़े सैकड़ों बाइक सवारों में से कई बिना हेलमेट होते हैं। पुलिस सामने खड़ी होकर भी आंख मूंद लेती है।
  3. घोषणा: “ट्रिपल सवारी न चलें!”
    हकीकत: एक ही बाइक पर तीन छात्र स्कूल जाते दिखते हैं — कोई कुछ नहीं कहता। बड़ा सवाल: जिम्मेदार कौन?
  4. माता-पिता:
    यदि बच्चा घर से दो दोस्तों को बाइक पर लेकर निकलता है, तो क्या माता-पिता को इसकी जानकारी नहीं होनी चाहिए? क्या उन्होंने ही उसे बाइक दी है?
  5. विद्यालय प्रशासन:
    स्कूल के समय के पहले या बाद के कुछ मिनटों में ट्रिपल सवारी या बिना हेलमेट छात्र स्कूल के गेट के बाहर दिखते हैं। क्या स्कूल प्रबंधन की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं?
  6. पुलिस प्रशासन:
    जब बच्चे स्कूल से पहले उतर जाते हैं और रास्ते में चौराहे पर पुलिस उन्हें रोकती भी है, तो सिर्फ फॉर्मल चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है। न कोई चालान, न अभिभावकों को बुलाया जाता है। ये सिर्फ दिखावे की कार्रवाई है। प्रस्तावित समाधान:
  7. डिजिटल निगरानी:
    ट्रैफिक कैमरों की मदद से ट्रिपल सवारी या बिना हेलमेट वालों की वीडियो क्लिप तैयार करके उनके घरों पर नोटिस भेजे जा सकते हैं।
  8. अभिभावकों की जवाबदेही तय हो:
    अगर स्कूली छात्र ट्रैफिक नियम तोड़ते हैं, तो स्कूल के माध्यम से माता-पिता को नोटिस भेजा जाए और उन्हें थाने में बुला कर हिदायत दी जाए।
  9. स्कूल की सहभागिता:
    स्कूलों में हर सप्ताह यातायात नियमों पर 10 मिनट की जागरूकता क्लास अनिवार्य की जाए। ट्रैफिक पुलिस द्वारा सेमिनार कराए जाएं।
  10. कठोर कार्रवाई:
    नाबालिग द्वारा वाहन चलाने पर वाहन जब्त कर लिया जाए और उसके लाइसेंस योग्य उम्र तक अभिभावक से लिखित माफीनामा लिया जाए।

मेरठ में ट्रैफिक नियम सिर्फ घोषणाओं और बोर्डों तक सीमित रह गए हैं। असल जिम्मेदारी तय करने वाला कोई तंत्र सक्रिय नहीं है। जब तक माता-पिता, स्कूल प्रशासन और पुलिस मिलकर सामूहिक जिम्मेदारी नहीं निभाते, तब तक नियमों की यह उड़ती धज्जियाँ मेरठ जैसे शहरों में आम दृश्य बनी रहेंगी।

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