मेरठ के थानों में चलता है दलालों का राज, सेटिंग से धाराओं में होता है खेल
गंभीर मामलों में भी मुल्ज़िमों को दिलाई जाती है जमानत, सिपाही से लेकर थाना प्रभारी तक जुड़े हैं खेल में: मेरठ – जिले के थानों में कानून की किताब से ज्यादा सेटिंग और सिफारिश का बोलबाला नजर आता है। गंभीर धाराओं के बावजूद, थानों में ऐसे-ऐसे खेल होते हैं कि आरोपी आसानी से छूट जाते हैं। दलालों की सक्रियता और पुलिस अफसरों की मिलीभगत से न्याय की बुनियाद हिलती नजर आ रही है।
- मुल्ज़िम के आते ही बजते हैं फोन, शुरू होती है छुड़वाने वालों की होड़
थाने में जैसे ही कोई बड़ा या रसूखदार आरोपी पहुँचता है, तुरंत ही फोन की घंटियाँ बजने लगती हैं। कोई नेता, कोई ठेकेदार, कोई कारोबारी – हर कोई अपने-अपने आदमी को छुड़वाने में लग जाता है। सिपाही से लेकर थाना अध्यक्ष तक हर कोई दबाव में काम करता है। ऐसे मामलों में अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज़ कर सिर्फ राजनीतिक और व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर धाराएं तय होती हैं। - गंभीर मामलों में भी सिर्फ धारा 151 में चालान
मारपीट, धमकी, जमीन कब्जे जैसे संगीन मामलों में भी थानों में सिर्फ शांति भंग की धारा 151 में चालान किया जाता है। इसका सीधा लाभ आरोपियों को होता है, जो कुछ ही घंटों में थाने से या कोर्ट पहुँचते ही बाहर आ जाते हैं। पीड़ित पक्ष न्याय की आस में बैठा रह जाता है, और आरोपियों के हौसले बुलंद हो जाते हैं। - नौचंदी और लोहियानगर थाने बदनामियों के केंद्र:
नौचंदी और लोहियानगर थाना क्षेत्र पिछले कुछ समय से लगातार चर्चाओं में बने हुए हैं। यहां के थानों में दलालों का सीधा हस्तक्षेप देखा गया है। थाना परिसर के बाहर अक्सर ऐसे लोगों की भीड़ दिखती है जो पैसे लेकर आरोपियों को छुड़वाने का वादा करते हैं। - दलालों की भूमिका पर नहीं होती कार्रवाई
सबसे बड़ी विडंबना ये है कि इन थानों में सक्रिय दलालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। उनका नेटवर्क इतना मजबूत हो चुका है कि वो थाने के अंदर-बाहर आसानी से घूमते हैं। कई बार इन्हें पुलिसकर्मियों के साथ बैठकर चाय पीते हुए भी देखा गया है, जिससे उनकी पकड़ का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।जबकि कुछ तो जेल तक जा चुके हैं! - कानून व्यवस्था पर उठते सवाल
इन घटनाओं से पुलिस व्यवस्था की साख पर सवाल खड़े होते हैं। यदि पुलिस खुद ही सिफारिश और पैसे के आधार पर कार्रवाई करेगी, तो आम जनता को न्याय कैसे मिलेगा? जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को इन मामलों पर संज्ञान लेकर पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।
निष्कर्ष:
मेरठ के थानों में कानून का नहीं, सेटिंग और सिफारिश का राज चलता है। यदि ऐसे हालात पर समय रहते लगाम नहीं लगाई गई, तो आम जनता का पुलिस पर से विश्वास उठ जाएगा।
